तस्वीरे : भारत की पुरानी यादें

भारत को मिली आजादी को आज 65 साल हो चुके हैं। हमने तस्वीरों के माध्यम से भारत

के संघर्ष के उन क्षणों को सामने लाने की कोशिश की है जो अब तक सामने

नहीं आए हैं। 17 अगस्त 1960 को ली गई इस तस्वीर में तत्कालीन

भारतीय प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू (1889-1964)

भारत के 14वें स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली में जमा भीड़ को

संबोधित करते हुए। उनके ऊपर भारत का राष्ट्रीय

झंडा फहराता हुआ।

1857 का गदर ब्रितानियों के खिलाफ भारतीयों द्वारा किया गया पहला गदर था।

तस्वीर में विद्रोह के दौरान दिल्ली में ब्रितानी फौज।

1857 के गदर के दौरान कानपुर में जंग के दौरान ब्रितानी फौजों की पूरी छावनी

खत्म कर दी गई थी।

भारत कई प्राचीन सभ्यताओं और सम्राटों का भूमि रहा है। कुछ तो 2000 बीसी तक

पुरानी हैं। इस तस्वीर में 1857 के गदर के दौरान दिल्ली में हुई जंग का नजारा

1857 की इस तस्वीर में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की बंगाल आर्मी में भारतीय

सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया।

1857 के गदर के दौरान ब्रितानी सिपाही दिल्ली में घुसते हुए।

1857 सिपाहियों के विद्रोह ने ब्रिटिशराज को हिलाकर रख दिया था। झांसी में करीब

आते भारतीय सिपाहियों से घबराकर मेजर स्कीन ने खुद को गोली मार ली।

1857 में गदर के दौरान 26वीं भारतीय रेजिमेंट को बैरकपुर में शस्त्रहीन करते हुए।

गदर की असफलता के बाद 1858 में भारत सीधे ब्रिटिश राज के अंतर्गत आ गया। दिल्ली

दोबारा हासिल करने के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने गदर में शामिल कई भारतीयों

को पकड़ लिया जिनमें कई को फांसी पर लटका दिया गया। इस तस्वीर

में दो भारतीय फांसी पर लटके हुए।

1857 में गदर की चिंगारी तब फूटी जब ये अफवाह फैली कि कारतूसों में गाय और सूअर

की चर्बी का इस्तेमाल किया गया है। जो हिंदू और मुसलमान दोनों घर्म के

सिपाहियों के लिए अस्वीकार्य था। गदर के दौरान सेना की बैरक

में मौजूद भारतीय सिपाही।

1857 के गदर के बाद बॉम्बे इंफेंट्री के भारतीय सिग्नलर्स निगरानी रखते हुए।

लंदन में 1876 में इजिप्शियन हाल में हैमिल्टन प्रदर्शनी के दौरान भारत पहुंचने के लिए

अपनाए जाने वाले रास्ते की जानकारी देता पोस्टर।

1857 के गदर के दौरान दिल्ली दोबारा हासिल करने के बाद अफसरों का समूह।

1880 में वायसराय का भारतीय अंगरक्षक दल

ब्रिटिश अंपायर भारत में न सिर्फ मसालों और कपड़ों के व्यापार को नहीं करता था बल्कि

वो बड़े पैमाने पर अफीम के व्यापार में भी लगा था। 1882 की इस तस्वीर में

भारत के बाहर किए जाने वाले अफीम के निर्यात को दिखाया गया है।

पटना से तैयार माल गंगा के रास्ते कोलकाता भेजा जाता था।





1911 में किंग जोर्ज पंचम भारत के अपनी यात्रा के दौरान बाघों के शिकार के बाद

उनका मुआइना करते हुए।



Posted by राजबीर सिंह at 12:07 am.
 

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