देश से भ्रष्टाचार का नासूर खत्म होना चाहिए : राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल
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राष्ट्रपति ने रविवार को 'मजबूत' लोकपाल के लिए अभियान चला रहे सामाजिक कार्यकर्ताओं को जाहिरा तौर पर याद दिलाते हुए कहा कि संसद जैसी संस्थाओं के प्राधिकार और विश्वसनीयता को जाने-अनजाने घटाने की कोशिश नहीं होनी चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि वह चाहती हैं कि भ्रष्टाचार का नासूर खत्म हो.
सभी को दायरे में शामिल करते हुए लोकपाल विधेयक के लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में सामाजिक कार्यकर्ताओं के अभियान के संदर्भ में प्रतिभा ने कहा-''इससे (भ्रष्टाचार से) निपटने के लिए कोई एक उपचार या नुस्खा नहीं हो सकता बल्कि विभिन्न स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था कायम करनी होगी तथा उसे प्रभावी तरीके से लागू करना होगा."
स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने कहा- ''संस्थानों की विश्वसनीयता उनके आचरण पर निर्भर करती है जिसे संवैधानिक रूपरेखा के भीतर होना चाहिए. उन्हें और उनकी क्षमताओं को जब कभी जरूरी हो, हमें सुधारात्मक कदम उठाने के लिए मजबूत करना चाहिये. जाने या अनजाने ऐसी कोई भी कोशिश नहीं होनी चाहिए जिससे संस्थागत विश्वसनीयता और प्राधिकार घटता हो."
राष्ट्रपति की टिप्पणी लोकपाल विधेयक के मुद्दे पर जारी हजारे के अभियान और उन पर लगे इस आरोप को लेकर छिड़ी बहस के परिप्रेक्ष्य में महत्व रखती है कि गांधीवादी कार्यकर्ता कानून बनाने की प्रक्रिया में संसद के प्राधिकार को नजरअंदाज कर रहे हैं. प्रतिभा पाटिल ने कहा कि संसद देश के सभी हिस्सों के लोगों और राजनीतिक विचार के व्यापक वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है.
उन्होंने कहा- ''उसके विधायी कार्य सामूहिक विचार और विवेक का नतीजा होते हैं. हमारे देश की संसद ने नई दिशा देने वाले कई कानून बनाए हैं. नए कानून भी विधायिका ही बनाएगी. जनमत बनाने के लिए देश की जनता के बीच चर्चा, बहस, बातचीत हो सकती है, जो सच्चे लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है." राष्ट्रपति ने कहा कि जरूरी विधेयक तैयार करने के लिए विभिन्न तरह के विचारों को जनप्रतिनिधियों के जरिये आकार दिया जाना चाहिए. उन्होंने कहा- ''हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हमें हमारे देश के लोकतांत्रिक मूल्यों को संरक्षित कर रखना है और इसके लिए संसदीय प्रक्रियाओं की स्वस्थ परंपरा को बनाए रखना होगा."
कुपोषण जैसे मुद्दों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर युवा सांसदों की पहल की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि ऐसे अन्य मुद्दों पर भी सभी दलों के सांसदों के जरिये सामूहिक रूप से ध्यान देने की संभावना मौजूद है. भ्रष्टाचार के बारे में राष्ट्रपति ने कहा कि यह एक ऐसा नासूर है जो देश के राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और सामाजिक जीवन को प्रभावित कर रहा है और इसे दूर करना जरूरी है.
उन्होंने कहा कि सरकार, संसद, न्यायपालिका और समाज को इस बारे में विचार करना चाहिए और इससे (भ्रष्टाचार के नासूर से) निपटने के ऐसे तरीके तलाशने चाहिये जो व्यावहारिक, अमल करने योग्य और टिकाऊ हों. प्रतिभा पाटिल ने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार से निपटने का कोई एक इलाज नहीं हो सकता. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार निरोधी एजेंडे पर आगे बढ़ने के लिए एहतियाती और दंडात्मक उपायों तथा तर्कसंगत दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी.
उन्होंने कहा- ''भारत अपनी गंभीरता और विवेक तथा संतुलित और संवदेनशील विचारों के लिए जाना जाता है." राष्ट्रपति ने संस्कृत के एक श्लोक का संदर्भ दिया जो कहता है कि 'अति सर्वत्र वर्जयेत्'. राष्ट्रपति ने कहा- ''हमें देश में मजबूत संस्थानों की जरूरत है, हमें सुशासन की जरूरत है. हमारे संस्थानों को मजबूती देने और हमारे शासन को भी निरंतर सुधारने की जरूरत है. हमें हालात का विश्लेषण करना चाहिए और हमारे समक्ष मौजूद चुनौतियों के हल विचारशील तरीके से ढूंढ़ने चाहिए."
उन्होंने कहा कि देश का संविधान सभी के लिए है. राष्ट्रपति ने कहा- ''इसके द्वारा बनाए गए संस्थान-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका-स्थिर रहे हैं और उन्होंने काफी कुछ हासिल किया है. अधिकारों का विभाजन, परस्पर नियंत्रण और संतुलन की व्यापक व्यवस्था ने हमारे देश को शासन का ऐसा ढांचा दिया है जिसमें संतुलन बनाए रखा जाता है और हर संस्थान दूसरे संस्थानों के जिम्मेदारी वाले क्षेत्रों का सम्मान करता है."